Ladki hoon! Ladti hoon!
- ISBN 9789359068565 (ISBN Edition: E-Book 2026)
- GGKEY: G4KCLA6P8EZ / ASIN : B0FXW9P9Z1 (First Published Digitally 2025)
- टाईटल : लड़की हूँ! लड़ती हूँ!
- Title : Ladki hoon! Ladti hoon!
- Author : Harsh Ranjan
- Publisher : Editon: E-Book: Self Published (2025)
- Publisher : Editon: ISBN Edition E-Book: Self Published (2026)
- Language : Hindi
- Print length: 195 pages
- Full Essay
- Versions : E-Book
- Non-Fiction
Description
‘लड़की हूँ! लड़ती हूँ!’ से उद्धृत
प्रकृति ने हमें जीव बनाया और हमने मानवता ओढ़ी। इसी तरह हम मानव बने और हमने अपनी अपनी सभ्यता संस्कृति ओढ़ी। बिल्कुल जैसे हम शरीर से संरचना में समान हैं पर भिन्न भिन्न वस्त्र ओढ़ते हैं। एक ओढ़ाव के भीतर एक सत्य और उसके भीतर फिर एक ओढ़ाव और उसके भीतर फिर एक सत्य होता है, यही क्रम चलता रहता है। सृष्टि से चिढ़ न करें, उसके नियम से दुराव न रखें। ओढ़ाव बदलने के लिए हम आज़ाद हैं पर शरीर की संरचना बदलना संभव नहीं।
इतिहास और धरती दोनों गोल घूमती है और इससे हमें ये पता चल जाता है कि आधे वक्त हम आगे बढ़ते हैं, आधे वक्त लौटते हैं। यही मानव बुद्धि की भी गति है। वो संतुष्टि से असंतुष्टि और फिर वहाँ से संतुष्टि पर लौटता है। कहा ही है सत्ताविरोधी लहर। नए की खोज। आगे बढ़ने के उद्यम।
आगे बढ़ते-बढ़ते लोग भूल जाते हैं कि पिछले दौर को पीछे छोड़ने की क्या प्रेरणा और क्या कारण थे। उन्हें आज के बारे में पता है, जब ये आज, कल बन जाएगा फिर वो भी इन्हें अजनबी लगेगा। जिन्हें आप न याद कर पा रहे हैं, न जानते हैं, उसके बारे में धारणा बनती है, ग़लत बने या सही बने। कभी कभी नैरेटिव बनता है। सच का प्रचार करो पर वही कि गली गली गोरस फिरे वाली बात।
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