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Papa Piggybank Aur Paitrik :Sanchayimaan

  • ASIN  B09NZ8ZLG2
  • टाईटल :  पापा पिगीबैंक पैतृक संचयीमान
  • Title : Papa Pigibank Paitrik Sanchayiman
  • Author : Harsh Ranjan
  • Publisher ‏ : ‎ The Digital Idiots
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • Print length:  ‏ 97pages
  • First Part of One complete Novel
  • Versions : E-Book
  • Fiction
Category:

Description

‘ पापा पिगीबैंक पैतृक : संचयीमान’ से उद्धृत

आदमी कुछ खाता है तो कुछ जनता भी है, कंकड़-पत्थर या कुछ और। एक पूरी जिंदगी गुजार ली तिवारी जी ने, कमाया, खाया, जोड़ा क्या?

जिंदगी की कुछ स्थाई उपलब्धियां होती हैं। एक है बेटे-बेटियों के प्रति कर्तव्य, एक खुद के प्रति। माँ-बाप बच्चों के लिए गुल्लक जैसी चीज होने चाहिए जो कि मुसीबत में उनकी मदद करें, उनके काम आएं। माँ-बाप बोझ बनकर बच्चे के सिर बैठ जाएं, ये न बच्चे के लिए अच्छा है और न तो माँ-बाप के लिए।

 

ऐसा नहीं होता कि जिंदगी में सब कुछ ऊंचे आदर्शों को सिरहाने या ध्यान में रखकर ही किया जाता है। कुछ काम लोगों से औचक और अनायास ही हो जाते हैं और कुछ काम ऐसे होते हैं जिनकी प्रेरणा बहुत छोटी सी होती है। कुल-मिलाकर हमलोग कह सकते हैं जिंदगी में सबकुछ प्लान करके नहीं होता फिर भी हमें लगता है कि हमने सब सोचकर ही किया है…एक बड़ी मासूम सी कहावत है अंग देश की, बौधा के मालिक सीताराम! (नासमझों के रखवाले, भगवान है।)

 

 

 

 

 

 

 

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