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अंधा कानून

अंधा कानून

"मुद्दा गर्म है, आपने अगर कहा है तो मुझे भी लगता है कि सशक्तिकरण गलत टर्म है!" उस आदमी ने मेरी जिह्वा घिस जाने के बाद, मानो सांत्वना पुरस्कार दिया हो! या हो सकता है कि जिह्वा पर फिर से धार लगाने का एक लंबा सा अवकाश दिया हो। सशक्तिकरण व्यक्ति नहीं, समीकरण व वर्ग का होता है। अपराध के हारकर व्यक्ति रोता है, वर्ग केवल उस अनवरत रोते इंसान के आंसू से अपने नेता के चरण धोता है, वो…

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उत्तरदायित्व

उत्तरदायित्व

अच्छे बेटे माँ-बाप के साथ संस्कृति-सभ्यता, समाज की समझ के लिए एक नवीन खोज की एक प्रयोगशाला होते हैं, माँ-बाप अपने रग के खून अपनी उम्र के जुनून को टटोलते है, पूछिये उनसे प्रयोगशाला के बारे में वो क्या बोलते हैं! अच्छी बेटियाँ माँ-बाप के साथ संस्कृति-सभ्यता, समाज के अस्तित्व के लिए धन-पुण्य है! उसके अलावा उनकी सकल कमाई और पूंजी शून्य है! पुत्रों की तरह पत्थर समुद्र से जूझकर रामसेतु बना देते हैं और पुत्रियों की तरह जेवर लोग…

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बार्बी फ़ॉर सेल

बार्बी फ़ॉर सेल

बहुत खूबसूरत लड़कियाँ! अक्सर दुख झेलती हैं! उन्हें लगता है कि वो सब कुछ खरीद सकती हैं, फिर एक रात वो खुद खरीद ली जाती हैं! ठहरो! सुनो! तुमने जिसे खूबसूरती माना वो असल में रहा था किसी का निर्दोष प्यार! जिसे उपहारों के बीच उपहार बना किसी को सौंप आये, तुम्हारे पिता की तरफ से तुम्हें हृदय से आभार।

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जून सेशन 2012

जून सेशन 2012

एक अकेला आदमी उम्मीद के साथ खड़ा है मैं आदतन उसके पीछे खड़ा हो रहा हूँ। न! ये उसकी, मेरी या हमारी मजबूरी नहीं है। एक अकेली आस को जिंदा और किसी के लिए चुनिंदा बने रहने के लिए कहीं ज्यादा ताक़त चाहिए! हो सकता है गलतफहमी हो टूटे मेरी बला से, किसे फिक्र है! पर मेरी साँसों के बाद! मुझे दाता से बस इतनी राहत चाहिए!

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सवेरा कहीं और है

सवेरा कहीं और है

हवा में तैरते सत्य को मैंने पन्ने पर रख दिया, पन्ना आदतवश हर सड़क, गली, नुक्कड़ उसे पेश कर आया। लोगों को लगता है कि एक तमंचा लेकर घर से निकला आज़ाद पागल था, एक बम फेंककर फांसी चढ़ते युवा सनकी थे, डेढ़ किलो के दिमाग में किताबें भरकर पीढ़ी दर पीढ़ी चलते आते लोग व्यसनी थे। अनपढ़ देश मे कागज़-कलम दयनीय हैं खासकर कि तब जब देश में दर्जन भर लिपियाँ हो! कुछ लोग आज भी मानते हैं कि…

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हिंदी दिवस और मेरी साइट का लोकार्पण

हिंदी दिवस और मेरी साइट का लोकार्पण

ॐ नमः शिवाय। हिंदी दिवस मुझे वर्तमान परिपेक्ष्य में हमेशा अधूरा लगा है। ये दिन मुझे भान कराता है कि कैसे कलियुग में हर अच्छाई, बुराई या कि चुनौती बनती गयी। जो भारतवर्ष की अच्छाई थी, विशेषता थी, सुंदरता थी, ताक़त थी, वो हर चीज 'बाहरी' मानसिकता वालों या उनसे प्रेरित लोगों ने बुरी देखी या हमें दिखाई और फिर उनकी बनाई व्यवस्थाओं ने उनकी समझ से उपजा कोई तथाकथित समाधान हमपर थोप डाला। ऐसे कई उदाहरण हैं। मैं पहले…

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ॐ नमः शिवाय!

ॐ नमः शिवाय! श्री हरि! वक्रतुंड महाकाय! सूर्यकोटी संप्रभ! निर्विघ्नम कुरु मे देव, सर्वकार्येषु सर्वदा!  

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