सरफरोश
बचपन से मैं देखता रहा,एक कोठा, ऊंचा, अपने घर के आगे!जिसने भरसक हवा, धूप और संसार कोमेरे ओझल रखा।बचपन में मेरी जिद पर माँ कहती,कोठे से बुढ्ढा आएगा और मुझे ले जाएगा!मैं चुप हो जाता।थोड़ा बड़ा होने पर पिता डराते,बात न मानी तो वो कोठे की छत परमुझे अकेला छोड़ आएंगे।कइयों ने कहा कि कोठे नेस्कूल और मैदान जाने के रास्तेलंबे, मुश्किल और बेढंगे कर दिए हैं।फिर मैंने जिंदा, चलती-फिरती,बातें करती, अपनी तमन्ना देखी,जो राहों पर बढ़ती हुई,कोठे की आड़…
