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अंधा कानून

“मुद्दा गर्म है, आपने अगर कहा है तो
मुझे भी लगता है कि सशक्तिकरण गलत टर्म है!”
उस आदमी ने मेरी जिह्वा घिस जाने के बाद, मानो
सांत्वना पुरस्कार दिया हो! या हो सकता है कि जिह्वा पर
फिर से धार लगाने का
एक लंबा सा अवकाश दिया हो।
सशक्तिकरण व्यक्ति नहीं, समीकरण व वर्ग का होता है।
अपराध के हारकर व्यक्ति रोता है,
वर्ग केवल उस अनवरत रोते इंसान के
आंसू से अपने नेता के चरण धोता है,
वो नैरेटिव बनाकर,
तौल-मापकर घड़ियाली रुदन रो लेता है।
निरपराध को वर्ग नहीं बचाता,
शक्त वर्ग अपराध को आड़ देता है!
वो अपराध के भुक्त भोगी के लिए
आखिरी उम्मीद भी उखाड़ देता है।
एक वर्ग के दुख बिकते हैं, आंसू दिखते हैं,
न्याय के दावे, वर्ग-वाद के आगे कहाँ टिकते हैं!
सशक्तिकरण मानकर चलता है कि
ये पक्षपात, किसी कारणवश जरूरी है,
न्याय को दरकार सिर्फ एक वर्ग की है,
बाँकी के लिए वो महंगा, अथवा व गैर जरूरी है।
कानून अंधा इसलिए नहीं कि
उसकी आँखों पर पट्टी बंधी है,
उसने अंधा होना इसलिए स्वीकार किया कि
उसे मालूम है, उसके लिए कितना देखना सही है।