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सरफरोश

बचपन से मैं देखता रहा,
एक कोठा, ऊंचा, अपने घर के आगे!
जिसने भरसक हवा, धूप और संसार को
मेरे ओझल रखा।
बचपन में मेरी जिद पर माँ कहती,
कोठे से बुढ्ढा आएगा और मुझे ले जाएगा!
मैं चुप हो जाता।
थोड़ा बड़ा होने पर पिता डराते,
बात न मानी तो वो कोठे की छत पर
मुझे अकेला छोड़ आएंगे।
कइयों ने कहा कि कोठे ने
स्कूल और मैदान जाने के रास्ते
लंबे, मुश्किल और बेढंगे कर दिए हैं।
फिर मैंने जिंदा, चलती-फिरती,
बातें करती, अपनी तमन्ना देखी,
जो राहों पर बढ़ती हुई,
कोठे की आड़ में कहीं गुम हो गयी।
उस रात एक किशोर बहुत रोया।
रात भर वो कोठा मुस्कुराता रहा
अपनी सस्ती रोशनी की मुस्कान।
फिर सवेरा खुला, झीने कुहरे में,
वो किशोर, एक युवक बन
सामने खड़ा था द्वार के,
रीते हाथ, सब कुछ हारके।
उसने पाया था कि कोठे की
दीवारों पर व्यंग्य उकेरे गए हैं।
उस दिन उसने सोचा था कि
शायद ही अब कुछ कमाना है,
अब एक ही जिद है कि
सामने खड़े, इस ढीठ कोठे को
घुटनों से भी नीचे गिराना है।
जिंदों को वजह भी चाहिए
इससे शानदार और क्या होगा,
मैं गिरूं या पहले ये गिरना चाहिए।
लोग कहते हैं प्यार,
मैं जानता हूँ कि नफरत और उधार
अधिक आवेग से गुजरे हुओं को
लौटाकर लाते हैं।
कोठे वाले नहीं जानते
जब जिंदा रहना ध्येय या मजबूरी न रहे
तो लोग कुबेर के खजाने भी
चंद्रमा के गड्ढों में गाड़ आते हैं।