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Copy Of सदा तुम्हारी, ज्योति – 1

Vidagiri : Rasm aur Honi

  • ASIN : B096T3ZGQD
  • टाईटल : विदागिरी / विदाई
  • Title : Vidagiri / Vidaai
  • Author : Harsh Ranjan
  • Publisher ‏ : ‎ The Digital Idiots 
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • Print length ‏ : ‎ 125 pages almost 
  • One Complete Novel
  • Versions : E-Book
  • Fiction
Category:

Description

‘विदागिरी ‘ से उद्धृत

कहाँ बच्चों के उमंग भरे बेतरतीब कदम और कहाँ वो भटकाव, कहाँ ये ठहराव। समय वापस नहीं आयेगा कि हम सब-कुछ ठीक कर सकें।

शादी हुई, उसी मंदिर में हुई जिसे लोग असुबाहा-स्थान कहते हैं। उस मंदिर को लोग अशुभ के लिए जानते हैं…. हाँ वो मंदिरों में अपने आप की एक अलग पहचान बना गया है।

मैं कदम-कदम बढ़ी जा रही थी… मुझे लग रहा था कि मैं किसी महासमुद्र को पार कर रही थी, कोई टाईम-ट्रेवल कर रही थी… मुझे हर कदम पर महसूस होता कि मैंने किसी दौर को लांघा हो! 

… बचपन!

…. विघटन!

….बाबा को खोना!

….. विस्थापन!

…. संघर्ष!

…. भटकाव!

….अभाव!

….भैया को खोना!

…..वीणा का बिछोह!

….. नितांत अकेलापन!

…. रोशनी!

…..रोशनी से घिरे अंधेरे!

…..और आज का दिन!

और सामने अम्मा बैठी हुई है जैसे किसी पुराने भव्य महल का शताब्दियों बाद जीर्ण शीर्ण खंडहर हो!

इस सबके अलावा और भी बहुत कुछ था जो मैं शायद बहुत छोटी हूँ व्यक्त करने के लिए बस मैंने पीछे मुड़कर देखा तो लगा कि पूरा गाँव, समाज मसान बन चुका है, जिस घर-आँगन खेली, जिस सड़क पर दौड़ी-भागी, जिस दुनिया में मेरा बचपन बसता था, वो पीछे धू-धू कर जल रहा है और मैं अपनी आँखें और आंचल बचाकर, उससे कतराकर बस निकल रही हूँ जैसे आज किसी से कोई मतलब न रहा, सब पराए हैं, जिनका दुख ही क्या और जिनका सुख ही क्या!

वर्तमान 

हम सब चुपचाप वाणी को सुन रहे हैं। 

उसने मेरी तरफ देखा…. 

-आप पूछ रहे थे ना पापा ने विदाई के वक्त धीरे से क्या कहा।

-हाँ!- मैंने कहा।

-पापा ने कहा था इस खण्डहर से तुम्हारी विदाई हो रही है बेटा। तुम्हें महल के द्वारे तक छोडकर आया हूँ। माँ-बाप बेटी के आँसू का कारण न बने यही बेटी के माँ-बाप के जीवन की सार्थकता है। 

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