अगम्यागमन
आदमी को सिर्फ एक कदम
चलना था चौखट लांघने को।
ये कदम था, उसकी समझ!
उसी दूरी, उसी गत के लिए
उसी बदनामी और दुर्गत के लिए
स्त्री को साढ़े चार कदम
चलना होता है, वो गिनती है,
एक उसका स्त्रीत्व!
दो, उससे सम्बद्ध कोई पौरुष!
तीन उसका परिवार!
चार समाज और संस्कार!
अंतिम!
साढ़े चार कदम जो बनती है
वो दूरी नहीं एक दैवी हिचक है,
जो जननी को कामिनी के नाम से
पुकारे जाने से होती है!
चौखट लांघकर वो
आठ-आठ आंसू रोती है।
उसे पता है कि इन साढ़े चार कदमों में
उसने संसार लांघा है,
अगम, कल्पनातीत,
बेपरवाह, बला की निर्भीक,
वो जब पीछे मुड़कर देखती है
तब उसे पता होता है,
ये उसका अनंत तक लौटकर जाना
मृत्यु से भी कठिन निभाना होता है।
उसी नर्क में जलते हुए,
मल-मूत्र-वीर्य-पीव में चलते हुए
उसने अपने साथी पुरुष को देखा
जिसने साथ लांघी थी लक्ष्मण-रेखा।
छिपकली के दुम से ज्यादा कटने को आतुर
उसके अंगों से बहते पाप को,
अपने चेहरे पर लिखे श्राप को,
वो रक्त और आँसू से धोता है,
और पाता है कि वैकुंठ उसके आगे
तत्क्षण खुला होता है।
स्त्री मुस्कुराती है,
योजनों तक फैले रौरव में,
मलिन, विक्षत गौरव में,
वो दर्द नहीं, अपराध-भाव से,
वो गलती नहीं, चुनाव से,
वो भ्रम नहीं, बनाव से,
हारी सी, समझकर सब बेचारी सी,
हामी भरती है कि
जहाँ पुरुष का पश्चाताप खत्म होता है
वहाँ से स्त्री का पाप शुरू होता है।
