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Harsh Ranjan
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ॐ नमः शिवाय!                                                                                                                                     श्री हरि!

नमस्कार,
हर्ष रंजन (पिछले दशक के ‘राजहंस’) की ओर से उसके अपने प्लेटफॉर्म पर आपका स्वागत है।  प्रकाशित चालीस से ज्यादा पुस्तकों के साथ मैं आप तक ये जरूर पहुंचाना चाहुंगा कि लिखना कठिन है, जीना थोड़ा और कठिन है, लेकिन लिखना और जीना, एक साथ, कहीं ज्यादा कठिन। अगर इतनी कठिनाई से मन तृप्त न हुआ तो थोड़ी कठिनाई और जोड़ लीजिए कि आप के रंगे पन्ने न नोटों की गड्डियां हैं, न तो प्रॉपर्टी के पेपर और न तो वसीयत के दस्तावेज। ये सिर्फ आत्म-अभिव्यक्ति है।
लेखक और वक्ता में सिर्फ इतना अंतर रहता है कि पहले वाले को ये नहीं पता कि उसे कौन-कौन पढ़ेगा। वो अक्सर उसे सुनाने लिखता है जिससे वो कह नहीं सकता, या वो वह पन्नों में डालता है जो वो कह नहीं सकता। या तो ये कोई दुख, कोई संताप होता है या कोई अनोखापन या कोई जानकारी।
ज्यादातर मौलिक लेखक कभी पैसे कमाने के उद्देश्य देखकर कलम नहीं उठाते। वो अपनी बात कहते हैं, अपेक्षा रखते हैं कि उन्हें समझा जाये और उनसे सहमत हुआ जाए या उनसे सहानुभूति रखी जाए। कुछ यही सोचकर मैंने भी लिखना शुरू किया था।

कई हिंदी लेखकों की तरह मैंने भी अपना एक छोटा नाम रखा, आनंद! आनंद, बंद कमरे में किताब के नाम पर कुछ-कुछ लिखके कमरे में ही उन सारे पन्नों के साथ दफन हो गया! एक लड़का फिर खड़ा हुआ, जिसका नाम था, राजहंस! ऑनलाइन दुनिया व पहुंच से ऊपर की ऑफ़लाइन दुनिया की कुछ बेहद कड़वी और अकथनीय सच्चाइयां घूँटकर वो लौट गया! सालों आस-पास की सर्द और बेदर्द, जानी-अनजानी गलियों में जीने का हुनर सीखने की जिद में, जो वो था वो बने रहने की जिच में, उसने हज़ारों पन्नों का संसार खड़ा कर लिया था।

ये किताबें आपके या कार्यालयों की लाइब्रेरी में या फिर इंटरनेट के डिजिटल जंगल में कुछ ऐसी ही हैं मानो मिट्टी पर गिरा खून। वो कुछ समय बाद दाग बन रह जायेगा और फिर हल्का होता मिट जाएगा। ये जिंदगी के धरातल पर रगड़ खाते हुए चुक गयी जीवन-ऊर्जा है।

कोई भी यथार्थ-वादी लेखक बस यही चाहता है कि जो उसने देखा, या उसके साथ हुआ, वो दुर्देव या मानवीय/सामाजिक/व्यवस्था-जनित भूल दुनिया मे दुबारा न हो!

पिता श्री मृत्युंजय मिश्र और माँ श्रीमति आभा मिश्र के घर, भारत के एक छोटे से प्रांत बिहार के एक सीधे-सादे  शहर पटना में मेरी आँखें खुली थी और फिर मैंने अस्सी से नब्बे के दशक से लेकर आज तक युगों और जगहों में हो रहे परिवर्तनों को जिया और लिखा। जहां तक संग्रह करने की बात आती है तो लगभग बीस साल पुरानी रचनाएँ तक आपको मेरी कलम की दुनिया में मिल सकती हैं। एक छोटे से शहर से, एक महीने भर में कमाने और रोज खाने वाले परिवार से सम्बद्ध रहा सो ज़िंदगी के शुरुआती तीन दशक मैंने खुद को एक दफ्तर के लायक बनाने में गुजार दिये। लंबी पढ़ाई के बाद बैंक के सूचना प्रोद्योगिकी विभाग में मेरी नियुक्ति हुई और फिर लंबे संघर्ष के साथ ज़िंदगी जारी है । इन वर्षों से मेरी बहुत सी पुस्तकें आप तक पहुँच चुकी हैं जो इसी काल-खंड में लिखी गयी हैं।

दस से अधिक कविता-संग्रह, पाँच से अधिक कहानी-संग्रह, कई निबंध और बीस से अधिक उपन्यासों को किंडल, गूगल बुक्स, कोबो और पेपरबॅक या हार्ड-कवर के रूप में मैंने आप-तक पहुंचा दिया है। अब जरूरत अनुभव हुई आत्मनिर्भरता की! सामग्री भी बढ़ती जा रही है, खुद के विचार और प्रस्तुति की पद्धति के साथ एक मंच जरूरी था जो कि सौ टके अपना हो! लीजिये ये हो गया। मेरी भावी रचनाएँ आएंगी और वो सबसे पहले इसी साईट एवं मेरे एप्प पर उपलब्ध होंगी। आप इस नयी साहसिक शुरुआत के लिए अपनी शुभेच्छा जताना चाहें तो मेरे प्रयत्नों को जिंदा रखने के लिए प्रोत्साहित करें।

हर्ष रंजन