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Dhalti Saanjhon Mein

Dhalti Saanjhon Mein

  • ASIN: B0H159MT9N
  • GGKEY: RLB8KEPFRTG
  • टाईटल : ढलती साँझों में
  • Title : Dhalti Saanjhon Mein
  • Author : Harsh Ranjan
  • Publisher ‏ : ‎ Editon: E-Book: Self Published (2026)
  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • Print length ‏ : ‎ 100 pages almost  
  • Poetry Collection
  • Versions : E-Book
  • On Amazon/Kindle
  • On Google Books
Category:

Description

ॐ नमः शिवाय!
हर्ष रंजन अर्थात मेरी ओर से आप लोगों को फिर से एक बार नमस्कार! एक और कविता संग्रह प्रस्तुत कर रहा हूँ! संग्रह का नाम है, ढलती साँझों में! नाम से आपको ये लग भी सकता है कि वियोग अथवा संयोग शृंगार की कवितायें इसमें संचित हैं, किन्तु ये कविता संग्रह उसके अलावा बाँकी सब कुछ है। कविता प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं है, ठीक उसी तरह जैसे कि मांसाहारी होटल में आपको पनीर मिल जाता है, उसी तरह कविता में प्रेम मिल जाता है! कविता का काम है प्रभावित करना! पुरातन काल में कन्याओं को प्रभावित करने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं थी, जो प्रभावित है, उन्हें और ज्यादा प्रभावित करने से ही क्या मिलना था! आजकल के युग में जब प्रभाव छोडने की आवश्यकता है तब कविता के भी बेहतर साधन उपलब्ध हैं उनके चित्त को हरने हेतु! किन्तु जैसे कि कभी-कभी किसी कारणवश मांसाहारी होटल में शाकाहारी लोग पहुँच जाते हैं, या लाये जाते हैं, या मांसाहारी लोग ही थोड़ा टेस्ट बदलना चाहते हैं, उसी तरह कविता ने प्यार का पनीर भी परोसा था!  कविता एक सशक्त माध्यम है, विचारों को प्रेषित करने का, उद्वेलित करने का, लोगों को उदाहरण के साथ समझाकर आंदोलित करने का। एक कवि, एक उद्बोधक, अभिधा भाषा में वचन कहता शुभचिंतक, एक गालीबाज़, एक चापलूस, एक समीकरण, एक रिपोर्ट या एक बरगलाने वाला अमित्र! इन सबमें कवि सबसे प्रभावी होता है, अगर वो सिद्धहस्त हो।  सीधी बात कहकर भी क्या, किसी का हित बताकर क्या, किसी को ज्ञान देकर क्या! लोग मानते हैं कि वो जानते हैं, जो नहीं जानते हैं वो भी मानते हैं कि वो जानते हैं, वो आपके मुख से सुनने को तैयार नहीं होते। कवि अपनी लाईन कह देता है, कइयों के लिए वो भाषा का रसिक है, कइयों के लिए वो मानसिक है, कोई उसे बेकार कहेगा, कोई उसे डरपोक कहेगा, लेकिन उसकी बात लोगों को याद रहती है! जो समझना चाहते हैं वो रुककर समझते हैं, वरना हँसते हुए गुजर जाते हैं…अपन भी हँस लेते हैं, कम लोग हमें समझें, अंदर से हम भी तो यही चाहते हैं!

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